सरपंच छवि राजावत – माँ भारती की एक कर्मठ प्रेरणा!!

Chhavi Rajawatछवि राजावत, एक MBA. भारत की सबसे युवा और पहली महिला सरपंच| यंग इंडियन लीडर अवार्ड (CNN-IBN, 2010), यंग ग्लोबल लीडर अवार्ड (वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम, 2012), साथ ही और भी कई अवार्ड्स से सम्मानित|

लेकिन मैं छवि जी का परिचय गांधी जी के कुछ Quotes के माध्यम से करवाता हूँ| “You must be the change you wish to see in the world” और “An ounce of practice is worth a thousand words.” ये छवि जी का वास्तविक जीवन है और अपने इस प्रकार के जीवन से उन्होंने गांधीजी के इस तीसरे Quote “My life is my message” को पूर्ण सार्थकता प्रदान की है|

माँ भारती की युवा शक्ति और देश के लिए एक कर्मठ प्रेरणा, छवि जी से हमने Q&A इंटरव्यू के माध्यम से विभिन्न विषयों पर उनके मार्गदर्शक और प्रेरक विचार जानने का प्रयास किया|

आप अपने जीवन की अभी तक की यात्रा को क्या शीर्षक देना चाहेंगी?

चुनौतियाँ – हौसला, विश्वास
रुकावटें – संघर्ष
सफलता – अनुभव, परिपक्वता, संतुष्टि
किन्तु लक्ष्य अभी भी दूर|

कृपया आप अपने बारे में और आपको मिले कुछ ख़ास अवॉर्ड्स/उपलब्धियों के बारे में हमारे पाठकों को बताएं? साथ ही जनसेवा और देशसेवा के लिए आपके द्वारा लिए गए इस महत्वपूर्ण एवं साहसी निर्णय के बारे में भी बताएं?

मेरे बारे में अधिक जानने के लिए आप मेरी प्रोफाइल देख सकते हैं|

अवॉर्ड्स तो कई मिले हैं, पर इनमें से ख़ास हैं:

2012 में वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम द्वारा दिया गया यंग ग्लोबल लीडर अवॉर्ड|
2010 में CNN-IBN द्वारा दिया गया यंग इंडियन लीडर अवॉर्ड| और,
2011 भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा सम्मानित किया जाना|

जिसकी बात आप कर रहे हैं, वह मेरा पुश्तैनी गाँव है, मेरे अपने लोग मेरा अपना देश है| अपनों के लिए कुछ करना एक स्वाभाविक जज़्बा है| इसमें कुछ साहसिक या अनूठा होने की बात ही नहीं है| यह एक भावना है, जो सभी में होती है| अगर अंतर है तो बस इतना कि मैं उस भावना का निष्पादन कर रही हूँ|

आपके जीवन पथ में आए संघर्षों/कठिनाईयों के बारे में कुछ बताएं?

सरपंच पद का कोई ख़ास महत्त्व नहीं है| संविधान और किताबों में है, परन्तु यथार्थ में नहीं है| सरकारी तंत्र और राजनैतिक तंत्र एक प्रणाली के गुलाम हैं और इसको जिला व खंड स्तर पर व्याप्त जातिवाद और भ्रष्टाचार और भी जटिल बना देता है| इसके ऊपर मेरे लिए एक लड़की और कम उम्र का होना एक प्रतिरोध तो पैदा करता ही है|

सबसे बड़ी चुनौती गाँव वालों का जागरूक ना होना और जानकारियों का अभाव होना है| और आज़ादी के बाद से लगातार मिलती मुफ्त योजनाओं की बैसाखियों ने गाँववालों को निष्क्रिय, कामचोर और सरकार पर आश्रित रहने वाला अवसरवादी बना दिया है| अपने पाँव होते हुए भी बिना बैसाखियों के चलना वो भूल गए हैं|

ऐसे कौन से संघर्ष, कठिनाईयां या स्थितियां हैं, जिनका सामना आपको आज भी करना पड़ता है?

धन की कमी, सतत विकास के लिए दक्षता और भागीदारी की आवश्यकता है खासतौर पर शिक्षा, खेती, व्यावसायिक प्रशिक्षण, चारागाहों में पुनर्जीवन और जलाशयों के निर्माण के क्षेत्र में|

आप इन संघर्षों/कठिनाईयों को एक समस्या के रूप में देखती थीं या आगे बढ़ने के मार्ग में चुनौती के रूप में और आपने इनका सामना किस तरह से किया?

समस्या को चुनौती के रूप में देखेंगे, तभी तो सामना कर सकेंगे, क्योंकि चुनौती ही वो ज़िद, हिम्मत और विश्वास पैदा करती है, जो हमें लक्ष्य तक पहुंचाती है|

इन जीवन संघर्षों/कठिनाईयों का सामना करने के बारे में आपकी यह सोच आपकी उम्र, शिक्षा व अनुभव के साथ विकसित होती गई या इसके पीछे किसी की प्रेरणा और मार्गदर्शन भी रहा?

और

आपकी इस जीवन यात्रा व निर्णयों में आपके परिवार का क्या योगदान रहा? आपके संघर्ष, कार्य और सफलता के प्रति उनकी सोच आपके समान ही रही है या अलग है?

शिक्षा और अनुभव ज़रूर मेरे हथियार और संबल रहे हैं लेकिन इसके पीछे प्रमुख वजह मेरे माता-पिता का बिना किसी शर्त के दिया गया सहयोग ही है| वैसे मेरे पिता और मेरे नाना मेरे आदर्श हैं|

स्किल डेवेलपमेंट और पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट की दृष्टी से आप अपनी जीवन यात्रा को कैसे देखती हैं?

हर पल कुछ नया सीखने को मिलता है और एक नया कौशल (स्किल) जुड़ जाता है| अनुभव का खज़ाना तो हर पल बढ़ता ही है|

आप अपनी प्रमुख स्किल्स किन्हें मानती हैं और आपने इन्हें कैसे विकसित किया? क्या आज भी आप इन्हें बेहतर करने के लिए कार्य/प्रयास करती हैं?

व्यवस्थित और संगठित रहना तथा समय का सही प्रबंधन मेरी खासियत है| निश्चित रूप से एक वक्ता के रूप में भी मैंने अपनी पहचान बनाई है और कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं| इसके साथ ही मैंने सामाजिक और मानवीय संबंधों में भी सुधार किया है| मैं हमेशा सीखने और अपने आप को और बेहतर इंसान बनाने में प्रयासरत हूँ|

ये स्किल्स क्या आप पर थोपी गईं और आपकी शिक्षा, प्रशिक्षण एवं अनुभव के साथ-साथ डेवेलप होती गई या आपकी रूचि, प्रतिभा को देखकर आपको इसके लिए प्रोत्साहित किया गया या आपने ही स्वनिर्णय से इन्हें चुना था?

ये सभी प्राकृतिक क्षमताएं और प्रतिभाएं हैं, जो सभी को प्रत्यक्ष हैं| समय और अवसरों ने इन क्षमताओं को और संवारा और बेहतर किया है|

बच्चों/युवाओं पर थोपने के बजाय उनकी रूचि, प्रतिभा को पहचान कर, उसके अनुसार उनकी स्किल्स (कौशल) का चुनाव करना और उसके आधार उनके स्किल डेवेलपमेंट को आप कितना महत्वपूर्ण मानती हैं?

प्राकृतिक क्षमता और प्रतिभा को पहचान कर बढ़ावा देना हमेशा ही ज़बरदस्ती कुछ थोपने से बेहतर विकल्प है| जो भी प्रतिभा हमारे अन्दर से आती है, वो हमें प्रसन्नता देती है और वो कार्य भी हमें खुशी देता है| इसी कारण हम बेहतर परिणाम प्राप्त कर पाते हैं|

जीवन पथ का संघर्ष लोगों को काफी नकारात्मक, हीन, अकर्मण्य, भाग्यवादी, बदला लेने की भावना से ग्रस्त, आदि सोच वाला बना देता है या उन्हें गलत मार्ग पर ले जाता है, क्या आपके सामने भी इस प्रकार की स्थितियां/सोच उत्पन्न हुई और आपने उनका सामना कैसे किया? इस बारे में आप युवाओं को आपकी क्या सलाह है?

जैसा स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है – “आध्यात्म ही भारत की आत्मा है| पहले यह हमारी दिनचर्या और शिक्षा प्रणाली का हिस्सा था| परन्तु अब यह लुप्त हो रहा है| मेरे विचार से हमारे आध्यात्मिक और भौतिक जीवन में संतुलन की आवश्यकता है| हमारी प्राचीन गुरुकुल शिक्षा प्रणाली वो संतुलित और समग्र शिक्षा प्रदान करती थी| तथा एक आत्मविश्वासी और सम्मानजनक व्यक्तित्व का निर्माण करती थी|

आजकल नकारात्मकता और निष्क्रियता की दिशा में बह जाना बहुत आसान है| मैं उस राह में नहीं चलती बल्कि चुनौतियों को अवसरों के रूप में देखती हूँ – अवसर मेरे दायरे को बढ़ाने का और एक समाधान खोजने का|

मेरे लिए मेरी चुनौतिया एक सकारात्मक व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया हैं जो कि मुझे मज़बूत और बेहतर इंसान बनाती हैं| आध्यात्मिकता इसमें मेरी सहायता करती है, क्योंकि अगर आप आध्यात्मिक हैं तो आप हर स्थिति में सकारात्मक रह सकते हैं| मैं एक “ईशा मेडिटेटर हूँ (ईशा फाउंडेशन – फाउंडर: सद्गुरु जग्गी वासुदेव)| उनके “Inner Engineering” कार्यक्रम ने मुझे वह आधार और जागरूकता दी है, जिससे मैं सकारात्मक ररहती हूँ| अगर मैं कर सकती हूँ तो सभी कर सकते हैं|

“भारत में गाँधी, अम्बेडकर और अन्य महापुरुषों की बुराई व उनके विचारों का बिना जाने-समझे विरोध करना लोग अपना धर्म समझते हैं, कोई इनके बारे में ना पढ़ता है ना समझता है ना इन महापुरुषों से कुछ सीखना चाहता है? भारतीय समाज के नैतिक पतन और उनमें राष्ट्रीय चरित्र का अभाव अपने चरम पर पहुंचता जा रहा है|” क्या आपको लगता है कि यह इसके मुख्य कारणों में से एक है? आपके इस बारे में क्या विचार हैं?

मेरे अभिभावकों के समय स्कूल के पाठ्यक्रम में राजा हरिश्चंद्र, रजा शिव, उपमन्यु जैसे चरित्र कहानी के रूप में प्रेरणा देते थे, जब वो कहीं खो गए और किताबों में से निकाल दिए गए तो महात्मा गांधी और अम्बेडकर जैसे व्यक्तियों का राजनीतिकरण हो गया| इसलिए इनके गुणों को शुद्ध रूप से प्रस्तुत नहीं किया जाता|

आजकल बच्चे और युवा उपलब्ध जानकारी/जागरूकता (exposure/awareness) को जाने/अनजाने में ज्ञान/अनुभव (knowledge/experience) समझने लगते हैं| इससे या तो वे बेपरवाह या अति-आत्मविश्वासी हो जाते हैं और वे बड़ों/गुरुजनों की बात/मार्दर्शन को सुनाने/समझने पर कम ध्यान देते हैं| इसके साथ ही उपलब्ध साधनों का दुरुपयोग भी बहुत बढ़ता जा रहा है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण इंटरनेट है| आप इनके बारे में क्या सोचती हैं और इस बढ़ती प्रवृत्ति के नुकसान से वे कैसे बच सकते हैं?

और

बच्चों/युवाओं में आजकल आत्महत्या के प्रवृत्ति बहुत बढ़ती जा रही है| इन स्थितियों से बचने के लिए आप बच्चों, युवाओं, उनके अभिभावकों, और शिक्षकों को क्या सलाह देना चाहेंगी?

जब हमारी शिक्षा प्रणाली ही सूचनात्मक है शिक्षाप्रद नहीं है तो ज्ञान कहाँ से मिलेगा| हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली जो नालंदा में थी उसके अवशेषों को देखकर ही जवाब मिल जाएगा|

स्कूली शिक्षा के साथ-साथ परिवार के सदस्य भी बच्चों पर प्रभाव डालने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं| संयुक्त परिवारों में वास्तव में बहुत लाभ हैं| क्योंकि बच्चों को वहां पर हर आयुवर्ग के दृष्टिकोण, तौर तरीके आदि देखने को मिल जाते हैं| और बचपन से ही वे दूसरों के साथ चीजें साझा करने और तालमेल के गुण आत्मसात कर लेते हैं| मैं नहीं, हम की सोच का विकास होता है| और परिवार में ही अपने जीवन के आदर्श मिल जाते हैं|

भारतीय अभिभावकों का संरक्षण, अतिरक्षात्मक रवैया और बच्चों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण उनके समग्र विकास के लिए एक सही तरीका नहीं है| परिवार के बड़ों को और शिक्षकों को बच्चों के साथ बातचीत करने की ज़रूरत है| (मुझे ये लाभ घर और मेरे स्कूल (ऋषि वैली, आंध्र प्रदेश- जे. कृष्णमूर्ती फाउंडेशन) दोनों ही जगह प्राप्त हुआ| बड़ों का साथ अंतत: बच्चों को सही और गलत का अंतर समझने, मज़बूत व्यक्तित्व बनने और केन्द्रित रखने में सहायता करता है, ताकि वे सभी चुनौतियों का डटकर सामना कर सकें|

मैं सभी अभिभावकों और शिक्षकों से अनुरोध करती हूँ कि जो भी विचार मैंने अभी साझा किये हैं, उन पर ध्यान दें एवं बचपन में ही बच्चों के जीवन में आध्यात्म लायें| और युवा भी मेरी तरह ईशा फाउंडेशन के कार्यक्रमों का लाभ ले सकते हैं| हमें हमेशा सिखने को तत्पर रहना चाहिए|

क्या भारत के विकास में एक प्रमुख बाधा है “अंग्रेजी भाषा की कौशल (स्किल) पर वरीयता”? आपका इस बारे में क्या अनुभव रहा है और आप इस बारे में क्या विचार हैं?

भाषा को इतना महत्त्व देने कि आवश्यकता नहीं| यह तो सिर्फ एक संचार का माध्यम है| असल खजाना तो एक व्यक्ति का मैन ह्रदय और आत्मा है, चाहे वह ग्रामीण हो या शहरी, अमीर हो या गरीब| अप्रतिम व्यक्ति तो कहीं से किसी भी क्षेत्र से उभर सकते हैं| हमें एक अच्छे मन और आत्मा के निर्माण पर जोर देना चाहिए, जो हमें आध्यात्म (ना कि धर्म) की ओर ले जाए, क्योंकि आध्यात्म ही वो माध्यम है, जो एक मनुष्य को अपने साथियों और प्रकृति का आदर करना सिखाता है| भाषा हमें यह सब नहीं सिखा सकती है|

हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली और सेवा/व्यापार जगत की आवश्यकताओं बहुत ज़्यादा अंतर है, जिसका हल आसान नहीं लगता है| इसे दूर (bridge gap between theory & practice) करने के लिए आप विद्यार्थियों, युवाओं को क्या सलाह देना चाहेंगी और क्या आपने इस दिशा में कुछ कार्य किये हैं?

अगले पाँच साल जो सरपंच के रूप में हैं| मेरा प्रमुख कार्य यही रहेगा| जब तक मैं इस दिशा में कदम नहीं उठाती, कुछ बताना संभव नहीं है|

प्रगति और विकास में “एकीकृत” एवं “समन्वित” (Integrated & synergic) शिक्षा, स्किल व अनुभव का बहुत महत्व होता है? इस बारे में कृपया आपके विचारों/अनुभव से हमें अवगत कराएँ? विद्यार्थी और युवा अपनी शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान और स्किल कैसे विकसित कर सकते हैं इसके लिए आप उन्हें क्या सलाह देना चाहेंगी? क्या आप इस दिशा में कार्य कर रही हैं?

Sarpanch Rajawat 3 (photo credit Pallavi Kanungo)आजकल बच्चे सिर्फ नौकरी और टैस्ट जॉब की तरफ ही जाते हैं| जबकी कमाने के लिए इतने आयाम हैं, जिसके लिए बचपन से ही स्कूली शिक्षा के साथ-साथ और योग्यताओं का विकास बहुत ज़रूरी है|

हमारे गाँव के स्कूल में इस जुलाई सत्र से हम एक अतिरिक्त क्लास रख रहे हैं, जिसमें दस साल और उससे अधिक उम्र के बच्चों को ऐसा कुछ सिखा कर उनसे ही बनवाया जाएगा, जिसे हम बेचकर उस बच्चे का बैंक अकाउंट खुलवा कर उस पैसे को जमा करवाएंगे| ये चाहे महीने के 20 रुपये ही क्यों ना हों|

इससे बच्चों के अन्दर पैसे कमाने का जज़्बा, बैंकिंग और बचत तीनों ही आदतें उतर जायेंगी| सिखाने के लिए उदाहरण के तौर पर पुराने अखबार के लिफ़ाफ़े बनवाना है, जिसमें कोई कच्चा माल खरीदना नहीं पड़ता और बच्चा आसानी से सीख भी सकता है तथा आसानी से इसे बेच भी सकता है|

इसके लिए हमने अखबार के बैंक शुरू कर रखे हैं| जान पहचान के लोग कबाड़ी को अखबार ना देकर हमें दे देते हैं| इस तरह के कई आसान तरीके हैं, जिनसे बच्चों को स्कूल में ही कुछ सिखा के उनके अन्दर पढाई के साथ अपनी मेहनत से कमाने का जज़्बा पैदा किया जा सके|

गाँव में बच्चे और बेरोज़गार युवा सिवाए लफंडरी करने, मोबाईल से चिपके रहने और पत्ते खेलने में ही अपना समय बरबाद करते हैं| इस तरह के व्यसनों से भी दूर रहेंगे|

मार्केट इकोनोमी के चलते और खासकर जिन क्षेत्रों में जानकारी/जागरूकता का अभाव होता है उन क्षेत्रों के लोगों में राजनैतिक, धार्मिक, सामाजिक या अन्य कारणों से उनकी सोच में एक बन्धुआपन आ जाता है| यह उनके सामाजिक-उत्थान, प्रगति और विकास में एक बहुत बड़ा बाधक बना हुआ है? आपका इस बारे में मत क्या है, इसे कैसे दूर किया जा सकता है?

जागरूकता के अभाव के साथ-साथ आर्थिक स्थिति जहां कमजोर है, उन क्षेत्रों में राजनैतिक, धर्म का दुरुपयोग करने वाले एवं असामाजिक तत्व हावी हो जाते हैं| इस वजह से कमजोर कड़ी उनके प्रभाव में आ जाती है| इससे उभरने के लिए सबसे बड़ा ज़रूरी काम है- सर्वांगीण विकास| सभी को बुनियादी सुविधाएं, जैसे- शिक्षा, नौकरी आर्थिक अवसर प्रदान किये जाएँ|

क्या एक सकारात्मक सोच के साथ अपने अस्तित्व, जाति, धर्म, परिवेश और परिस्थितियों के सह-अस्तित्व को स्वीकार कर, उनका सम्मान कर और संघर्ष को समस्या के बजाय चुनौती मानकर उनका सामना करते हुए जीवन में आगे बढ़ना, सामाजिक उत्थान, प्रगति और विकास का मूल मन्त्र हो सकता है? आपका इस बारे में क्या विचार हैं? कृपया आपके गाँव/अनुभव से कुछ उदाहरण साझा कीजिये|

मैं वास्तव में यही सब कर रही हूँ और ये सब किस तरह से किया जा सकता है, इसका उत्तर मेरे ऊपर दिए गए एनी उत्तरों में ही मिल जाएगा|

सामाजिक-आर्थिक उत्थान (Socio-economic upliftment), प्रगति (growth) और विकास (development) के लिए आप विद्यार्थियों, युवाओं और भारतीय समाज को क्या सन्देश देना चाहेंगी?

Sarpanch Rajawat 2

किसी भी तरह के विकास के लिए हमें सबसे पहले सभी मनुष्यों और प्रकृति को सम्मान देना सीखना चाहिए| साथ ही अपने देश और प्रदेश को भी स्वतन्त्र रूप से सम्मान देना आना चाहिए|

जब तक हमारा देश एक राष्ट्र के रूप में सफल नहीं होता, हम एक व्यक्ति के रूप में सफल नहीं हो सकते| हमारे देश की प्रगति और विकास में बाधा वो भेदभाव उत्पन्न करता है, जो जाति, पंथ, लिंग और धर्म के रूप में मौजूद है|

जो विकास हम अपने लिए देखने की इच्छा रखते हैं, उसके लिए हमें सभी भेदभाव से ऊपर उठने की ज़रूरत है| साथ ही अपने देश के विकास में मदद के लिए आगे आने की ज़रूरत है|

हमें अपनी ताकत का एहसास होना ज़रूरी है, ताकि हम आश्वस्त होकर कदम उठा सकें, क्योंकि कुछ भी अपने आप नहीं होता, हमें करना पड़ता है|