“बंधुआ सोच” सामाजिक उत्थान और देश की प्रगति व विकास में सबसे बड़ी बाधा…..

“समर्थ सच्चा और सुन्दर अच्छा” रुपी कुँए के मेंढक की सोच ने लोगों को अंधभक्त और कर्म को तुच्छ व अपमानित करने वाला बना दिया है….

मैं पिछले वर्ष (2014) दिवाली की आस-पास पवई (मुम्बई) से मलाड (मुम्बई) तक ऑटो में आ रहा था| ट्रैफिक बहुत ज़्यादा था और 12 कि.मी. का यह सफ़र तय करने में लगभग 1 घंटा और 50 मिनिट लगे| इस दौरान ऑटो चालक से हुई बातचीत में कई अहम् मुद्दे निकल कर आये, जिन्हें हम भारतवासियों को समझाने और उन पर चिंतन करने की आवश्यकता है| साथ ही यह आम-जन-मानस की सोच और उनके नज़रिए को सही दिशा देने के लिए भी सहायक हो सकती है| इस बात-चीत में जो मुख्य बातें सामने आई वो है:

  • “समर्थ सच्चा और सुन्दर अच्छा” रुपी कुँए के मेंढक की सोच ने लोगों को अंधभक्त और गरीबी / कर्मठता / सरल व्यक्तित्वों को तुच्छ व अपमानित करने वाला बना दिया है;
  • गाँधी, अम्बेडकर और अन्य महापुरुषों की बुराई व उनके विचारों का विरोध करना लोग अपना धर्म समझते हैं;
  • गांधीजी और बाबा साहेब का सच्चा एहसास;
  • बंधुआ सोच सामाजिक उत्थान में सबसे बड़ी बाधक है;
  • शिक्षा प्राप्त करने और शिक्षित होने में बहुत ज़्यादा अंतर है;
  • देश की प्रगति और विकास में एकीकृत & समन्वित शिक्षा, स्किल व अनुभव का महत्व और
  • एक इन्सान का यह एहसास करना, “मैं कीड़ा-मकोड़ा नहीं, बल्कि अपने दम पर खड़ा आदमीं हूँ”|

ये बहुत रोचक और सीखने वाली बातचीत है| विस्तार से आपको उस बातचीत के बारे में बताता हूँ| वह ऑटो चालक लगभग 50 वर्ष के आस-पास रहा होगा और बहुत ज़्यादा ट्रैफिक और उसके शोर से परेशान हो रहा था| फिर अचानक वो इस सब के लिए व्यवस्था और साथ ही गाँधीजी व बाबा साहेब अम्बेडकर को दोषी ठहराने लगा| पहले तो उसकी बात सुन कर मैं परेशान हुआ फिर उसकी सोच और थोड़ा संशय करते हुए इस बात के पीछे उसके एजेंडे को समझाने के लिए मैंने उससे एक सवाल पूछा कि लौह पुरुष वल्लभ भाई पटेल जी के बारे में आपका क्या सोचना है…..इस सवाल का उसने बहुत उत्साह से उत्तर दिया कि सरदार पटेल सबसे सही आदमी थे और उन्होंने पूरे देश को एक करके रखा…इस पर मैंने उससे कहा की यदि गांधी जी अहिंसा का मार्ग पर चल कर देश को आज़ादी दिलाने के लिए अपना जीवन देश को समर्पित नहीं करते, करोड़ों भारतीय उनका साथ नहीं देते और हमें आज़ादी नहीं मिलती तो क्या आज तुम सरदार पटेल की तारीफ़ कर रहे होते…यह सुनकर वह ऑटो चालक कुछ सोच में पड़ गया…फिर मैंने आगे कहा कि यदि आज़ादी मिल भी जाती और सरदार पटेल देश को एक अखंड भारत के रूप में स्थापित भी कर देते पर देश को चलाने के लिए एक अच्छा संविधान नहीं होता जैसा कि बाबा साहेब अम्बेडकर ने बनाया था तो इस अखंड भारत का क्या होता?

मेरी इस बात को सुन कर कुछ देर सोचने के बाद उस ऑटो चालक ने कहा कि साहब आप ठीक कह रहे हैं, लेकिन होश सम्भालने के बाद से पिछले 30-35 साल में मैंने इस तरह तो कभी सोचा ही नहीं और न ही किसी ने इस प्रकार की बात कही| उसका गुस्सा एक प्रकार की व्यथा में बदल गया, मेरा उसके बारे में यह संशय कि “उसका कोई छुपा हुआ एजेंडा तो नहीं है” दूर हो गया और वह मुझे एक मेहनतकश आम भारतीय-सा प्रतीत होने लगा| साथ ही उस ऑटो चालक की एक ऐसी सोच “जिसमें उम्र के इस पड़ाव में और सतत संघर्ष के बाद भी जड़ता नहीं थी” यह देखकर मुझे बहुत सुखद अनुभूति हुई| यह सभी के लिए सीखने वाली बात है|

उस ऑटो चालक के जीवन की कहानी यह थी कि उसका जन्म उत्तर प्रदेश के किसी गाँव में हुआ था 4-5वीं क्लास तक पढ़ा फिर बड़ा होकर कई शहरों में मेहनत-मजदूरी की और अब पिछले 18-20 वर्षों से मुम्बई में ऑटो चला रहा है, परिवार भी है और जीवन के इस पड़ाव में भी जीवन का संघर्ष जारी है|

गांधीजी और बाबा साहेब का सच्चा एहसास….

फिर मैंने उस ऑटो चालक से अपनी बात कहना शुरू की| मैंने कहा कि बुरा ना मानो तो मै आपसे कुछ कहूं? उसने बहुत उत्साह से कहा हाँ-हाँ साहब मुझे कुछ सीखने को ही मिलेगा नहीं तो इन गाड़ियों के शोर में ही रास्ता कटेगा जैसे रोज़ होता है|

मैंने अपनी बात शुरू की, कि आपकी (ऑटो चालक) स्थिति भी उन अधिकाँश भारतीयों जैसी ही है जो “समर्थ सच्चा और सुन्दर अच्छा” की सोच के फेर में जीवन भर उलझे रहते हैं| स्वाभाविक है कि उस ऑटो चालक के लिए यह बात समझना बहुत मुश्किल या नामुमकिन था| फिर मैंने उसे उदाहरण से समझाने का प्रयास किया| मैंने कहा कि सरदार पटेल ने जो किया वह एक बहुत ही कठिन कार्य था लेकिन उनका महान कार्य आपको भी एक सामर्थ्य का भाव देता है और शायद इसलिए गांधीजी और बाबा साहेब की तुलना में आपको सरदार पटेल ज़्यादा सही लगते हैं| जबकी इन सभी और अन्य अनेकों लोगों का भी समान योगदान रहा है|

आगे मैंने उस ऑटो चालक को कहा कि गांधीजी की एक आवाज़ पर लाखों लोग मार खाने के लिए रोज़ घर से निकल आते थे क्या आप किसी अच्छे कार्य के लिए मार खाना तो दूर केवल आकर वहां खड़े रहने के लिए 8-10 लोगों को तैयार कर सकते हो| इस पर ऑटो चालक ने कहा नहीं साहब मेरे घर वाले ही नहीं आयेंगे बाहर वालों को क्या बुलाऊंगा| ऑटो चालक ने आगे कहा कि साहब ये बात तो सही है की गांधीजी के ऊपर देशवासियों को बहुत विश्वास तो था और देश दुनिया का हर बड़ा आदमी गांधीजी को अपनी प्रेरणा मानता है|

फिर मैंने उससे पूछा कि क्या आपके घर का टॉयलेट-बाथरूम साफ़ करने वाले के साथ बैठ के खाना खा सकते हो या एक कचरा बीनने वाले को अपने ऑटो में बिठाकर उसे ले जा सकते हो| इस पर ऑटो चालक तपाक से बोला कभी नहीं| मैंने ऑटो चालक की इस बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| मैंने ऑटो चालक को दो सच्ची बातें बताई| पहली मेरी माँ और शांति बाई की और दूसरी मेरे मित्र कैलाश वानखेड़े की|

शांति बाई, प्रोफ़ेसर कॉलोनी में सब घरों के टॉयलेट-बाथरूम साफ़ करने का काम किया करती थी और हमारे यहाँ भी करती थी| एक सीधी-सादी, सरल, सौम्य, समय की पाबन्द और बहुत कर्मठ महिला| शांति बाई घूंघट निकाल कर आती थी और अपना काम करके चली जाती थी| प्रोफ़ेसर कॉलोनी के लगभग सभी बच्चे शांति बाई के बच्चों के साथ खेला करते थे और हम लोगों में छोटे-बड़े, उंच-नीच का कोई भाव कभी नहीं था ना आया और ना ही हमारे अभिभावकों में| बचपन में मेरी माताजी मेरे जन्मदिन पर शांतिबाई को हमारे घर के चौके (किचन) में बुला कर मेरे सामने बैठाती थीं और और शांति बाई को कहती थीं कि इसे टीका (तिलक) लगाकर आशीर्वाद दो कि ये तन-मन और सोच से जीवन भर साफ़ सुथरा रहे| इस 2 मिनिट के इस शुभ कार्य के लिए शांति बाई को मनाने में काफी समय लग जाता था और तब जाके वह हमारे चौके में कदम रखती थे| मेरी माताजी की इस सोच की कृपा और और शांति बाई का आशीर्वाद मेरे ऊपर हमेशा रहा और हमेशा रहेगा|

फिर मैंने उस ऑटो चालक को दूसरी बात बताई| मेरे एक सहपाठी थे कैलाश वानखेड़े जो मेरे एक अच्छे मित्र भी हैं| मैं एक बार उनके साथ उनके घर गया| जब मैं उनकी कॉलोनी पहुंचा और उनके घर की ओर जा रहा था उस क्षेत्र में बहुत दुर्गन्ध आ रही थी और उसके कारण मेरे मन में कई तरह के विचार आने लगे जिन्हें अच्छा तो नहीं कहा जा सकता| फिर हम दोनों उनके घर पहुंचे| कैलाश ने मुझे पानी पीने को दिया जिसे मैंने बहुत डरते-डरते पिया| फिर कैलाश ने बहुत स्वादिष्ट चाय बनाई| और हम आपस में चर्चा करने लगे| मेरे मन में उस समय की परिस्थितियाँ बहुत ज़्यादा हावी थीं लेकिन फिर अचानक से मुझे मेरी माताजी की एक सीख याद आई कि हमेशा “सकारात्मक सोच रखो और उसी नज़रिए से कार्य करो” और मेरी सोच बिलकुल बदल गयी| मुझे अब उन स्थितियों/परिस्थितियों में कैलाश की लगन, मेहनत, अनुशासन और उन स्थितियों/परिस्थितियों के संघर्ष का पीड़ित बनने के बजाय सकारात्मक सोच के साथ कैलाश की कर्मठता दिखने लगी| उनके हर वर्ष प्राप्त किये 60% से ज़्यादा प्राप्तांक के सामने सर्वसुविधा संपन्न लोग मुझे बड़े तुच्छ लगाने लगे| और जब मैं कैलाश के घर से वापिस आ रहा था तब वही दुर्गंध अब सुगंध में बदल गयी थी| कैलाश अपनी मेहनत और ईमानदार कर्मठता से आज एक बड़े प्रशासनिक पद पर हैं| (और उनसे जुड़ी यह बात मैं पहली बार कह रहा हूँ|)

शायद यह मेरी माताजी की शिक्षा और उनकी सीख ही थी जिसने मुझे शांतिबाई और कैलाश में मुझे एक गाँधी, एक बाबा साहेब जैसे महापुरुषों का एहसास कराया|

बंधुआ सोच सामाजिक उत्थान में सबसे बड़ी बाधक है….

सोच का बन्धुआपनअपनी ये बातें कहने के बाद मैंने ऑटो चालक से पूछा कि शांति बाई और कैलाश के सामने आप अपने आप को कैसे देखते हो| वह ऑटो चालक शून्य हो चुका था और बड़ी मुश्किल से ऑटो चला पा रहा था| मैंने जब दुबारा उससे पूछा तब वह बोला कि साहेब इन दोनों के सामने तो मैं कुछ भी नहीं हूँ क्योंकि आपके जीवन में आज भी ये दोनों कितना महत्त्व रखते हैं और आपकी बातों से लगता है की आप भी कई लोगों के के जीवन में बहुत महत्त्व रखते होगे लेकिन ना मेरे जीवन में किसी का भी ऐसा कोई महत्त्व है ना ही शायद मेरा किसी और के जीवन में कोई महत्त्व होगा|

फिर उसने मुझसे पूछा की साहब बिना कुछ लिखे-पढ़े मैं यहाँ तक कैसे आ गया, अपना परिवार भी बनाया और अपना व परिवार का गुज़ारा भी कर पा रहा हूँ लेकिन बचपन से ही शायद आपके मित्र से अच्छी स्थिति में होने के बाद भी मैं जीवन में ना पढ़ पाया ना कुछ और ढंग का कर पाया और आज बस ऑटो ड्रायवर बन कर रह गया हूँ| जब तक जीवन है और हाथ-पैर चल रहे हैं मुझे तो बस यही करना है|

मैंने उसकी बात का उत्तर दिया कि “कोई भी काम छोटा नहीं होता है आप कोई बुरा काम तो कर नहीं रहे हो लेकिन आपकी स्वयं के बारे में विचार आपकी सोच के बन्धुआपन के कारण है”| इस बात पर वह सकपका गया और बोला साहब मैं बंधुआ कैसे|

फिर मैंने ऑटो चालक को विस्तार से समझाया कि वह यहाँ तक अपने हुनर/कौशल से पहुंचा है, जिस पर आजकल बहुत जोर दिया जा रहा है “स्किल डेवलपमेंट” के नाम से| कौशल के कारण आपको रोज़गार/आजीविका की कभी कमी नहीं हुई| जिसके सहारे आपने अपना जीवन जीया, अपना परिवार भी बनाया और आज ठीक-ठाक गुज़ारा कर पा रहे हो| जीवन के इस सफ़र से और आपके काम-काज से आपको हर स्तर का एक बहुत अच्छा अनुभव मिला, जिसने आपको बहुत कुछ सिखाया होगा और जीवन के हर उतार-चढ़ाव में सम्भलने/सम्भालने की शक्ति भी दी| आप आपके हुनर और आपके अनुभव से सीख-सीख कर यहाँ तक पहुँच गए|

लेकिन बचपन से ही आपकी सोच किसी ना किसी की बंधुआ रही है जिसके कारण आप आज तक कभी गांधी जी या बाबा साहेब या इस व्यवस्था या किसी अन्य को भला बुरा कहते रहते हो, कुंठित होते रहते हो, और उससे भी बड़ी बात कि आपको स्वयं अपनी और अपने हुनर/कार्य की भी कोई कद्र या कोई सम्मान नहीं है और इसीलिए आप अपनी मेहनत/कार्य को कोसते रहते हैं और आपको कोई कार्य/व्यक्ति छोटा-बड़ा या अच्छा-बुरा लगता रहता है| आपके ही जैसी बंधुआ सोच वाले किसी व्यक्ति/व्यक्तियों ने या आपकी सोच को बंधुआ बनाए रखने के उद्देश्य से समय-समय पर जिस व्यक्ति/व्यक्तियों ने जो कह दिया, बता दिया या समझा दिया आपकी बंधुआ सोच के कारण बस वह पत्थर की लकीर हो गयी| और आपने उसके आगे-पीछे, सही-गलत, नैतिक-अनैतिक कुछ भी नहीं सोचा न ही कभी इसके लिए कोई प्रयास किया|

यदि आपको सही शिक्षा प्राप्त हुई होती तो आपको विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त होता और आपकी एक जागरूक सोच विकसित होती, जिससे आपका स्वयं अपने जीवन, दुनिया और इनसे जुड़े विभिन्न पहलुओं को देखने का एक बेहतर, प्रगतिशील और व्यापक नज़रिया होता जो आपको व आपके जीवन को एक अधिक संपन्न और समृद्ध दिशा देने में सहायक होता| इसलिए स्किल/हुनर/कौशल और अनुभव के साथ-साथ हर व्यक्ति को अच्छी शिक्षा दी जानी चाहिए क्योंकि देश की प्रगति और विकास में एकीकृत & समन्वित शिक्षा, स्किल व अनुभव का बहुत महत्व होता है और इससे व्यक्ति, समाज और देश का चहुमुखी विकास होता है|

देश की प्रगति और विकास में “एकीकृत” & “समन्वित” (Integrated & synergic) शिक्षा, स्किल व अनुभव का महत्व….

अंत में मैंने ऑटो चालक से पूछा कि जानवर और इन्सान में क्या अंतर है….तो उसने कुछ अंतर बताये| फिर मैंने ऑटो चालक को जानवर और इन्सान में अंतर की अपनी समझ बताई कि दोनों में कर्म और व्यवहार का अंतर होता है| जानवरों के कर्म और व्यवहार लगभग निश्चित होते हैं जबकि इंसान के कर्म और व्यवहार अनिश्चित होते हैं और इसलिए इस अनिश्चितता और परिवर्तनशीलता के कारण सदियों के विकास के बाद आज हम इस रूप में हैं| लेकिन गाय, कुत्ता, शेर आदि सदियों से ऐसे ही हैं| यदि इंसानों के कर्म और व्यवहार में भी निश्चितता या जड़ता होती तो हम क्रमिक विकास के द्वारा आज इस स्तर तक नहीं पहुँच सकते थे| लेकिन इस विकसित रूप और स्तर के बाद भी हर मनुष्य को अपने जीवन काल में निरंतर सिखाना और विकास करना होता है| तभी वह व्यक्ति, समाज और देश प्रगति, सम्पन्नता, खुशहाली और समृद्धि को प्राप्त करते हैं|

ऑटो चालक मेरी बात से काफी सहमति जता रहा था| मैंने आगे उससे कहा की केवल शिक्षा प्राप्त कर लेने से ही कोई शिक्षित नहीं बन जाता और ऑटो चालक को कुछ देर पहले की एक बात याद दिलाई जब कार में बैठा एक तथाकथित पढ़ा लिखा समझदार लड़का मोपेड पर जा रही एक लड़की को गन्दी नज़र से देख कर भद्दे कमेन्ट कर रहा था और ऑटो चालक ने उस लडके को डांटा था और ऐसा नहीं करने को कहा था| मैंने ऑटो चालक से कहा की वह लड़का पढ़ा-लिखा शिक्षा प्राप्त था लेकिन शिक्षित नहीं था आपने कभी शिक्षा प्राप्त नहीं की लेकिन आप उससे बहुत ज़्यादा शिक्षित और समझदार हो| अपने लड़के को डांटा और उसने लड़की को छेड़ना बंद कर दिया इस पर लड़की ने नहीं छेड़ने के कारण उस लड़के को धन्यवाद नहीं दिया बल्कि उस लड़की ने अपनी सुरक्षा करने के लिए आपको धन्यवाद दिया और दुआ की कि सभी लोग आपके जैसे ही बनें| एक तरफ आप खुद अपनी, अपने काम की कद्र नहीं करते हैं वहीँ आपके एक काम पर एक अनजान लड़की आपको धन्यवाद देकर दुआ करती है की सभी लोग आपके जैसे हों| कितना विरोधाभास है|

बिना शिक्षा प्राप्त किये भी आप इतने शिक्षित हैं कि आपको समाज में सही-गलत का ज्ञान है| यदि आप बंधुआ सोच नहीं रखते तो आज आपका नजरिया काफी अलग होता| आप इन महापुरुषों को कोसने, भला-बुरा कहने के बजाय इन महापुरुषों और अन्य विषयों के बारे में पढ़ते, निष्पक्ष रूप से समझाने का प्रयास करते और उनसे प्रेरणा लेकर अपने उत्थान, प्रगति और विकास की एक बेहतर दिशा ले सकते थे| लेकिन अभी भी कुछ नहीं खोया यदि आपको हमारी इस बातचीत में कुछ सकारात्मक और सार्थक दिशा दिखती है तो प्रयास कीजिये कि आपका परिवार, मित्र और आपकी अगली पीढ़ी अपनी इस बंधुआ सोच को छोड़कर अपना नज़रिया बदलें और अपने और अन्य लोगों के जीवन को एक नई बेहतर दिशा की ओर मोड़ने का प्रयास करें|

मेरा उस ऑटो चालक से बाद में कोई संपर्क नहीं रहा कि मैं वर्तमान में उसके विचार जान सकूं और शायद मैं उसे अब पहचान भी ना पाऊं| लेकिन मैंने अपनी पूरी ईमानदारी से अपने ज्ञान और समझ से उस ऑटो चालक की सोच को सही दिशा में लाने का एक छोटा सा प्रयास अवश्य किया और मुझे मलाड (मुम्बई) मेरे गंतव्य स्थान पर छोड़ते समय उसके चहरे पर जो चमक, उत्साह और स्वयं के अस्तित्व के सम्मान का भाव था वो आज भी मेरे मन जीवंत है|

उस ऑटो चालक ने जाते-जाते जो कहा वह बहुत महत्वपूर्ण और दिल को छू लेने वाला था| कि साहब मैं आपकी बातों को ध्यान रखूंगा और बदलाव की कोशिश करूंगा| आज मैं अपने आप को कोई कीड़ा-मकोड़ा नहीं बल्कि अपनी मेहनत के बल पर खड़ा आदमी समझ रहा हूँ| और बापू और बाबा साहेब के बारे में मेरी सोच पर मुझे बहुत शर्म आ रही है वे मुझे माफ़ कर दें|

उसकी इन बातों में छिपी उसकी प्रगतिशील सोच, गलती स्वीकार कर क्षमा मांगने की हिम्मत और स्वयं की कद्र करने के एहसास ने मेरा दिल जीत लिया| कितने ही तथाकथित पढ़े-लिखों की तुलना में वह ऑटो चालक मुझे कहीं ज्यादा शिक्षित लग रहा था|

आइये इन छोटी छोटी बातों से किसी के जीवन की दिशा बदल कर उनकी दशा बदलने का प्रयास करें|

शिक्षा-स्किल-अनुभव - featuredयह घटना/बातचीत इस बात को साबित करता हैं “बंधुआ सोच सामाजिक उत्थान में सबसे बड़ी बाधा” है और “देश की प्रगति और विकास में एकीकृत & समन्वित शिक्षा, स्किल व अनुभव बहुत महत्वपूर्ण है”| क्योंकि, यह आम-जन-मानस की बंधुआ सोच को समाप्त कर उन्हें अपने जीवन, प्रगति और विकास की आवश्यकताओं को समझाने, आत्मनिर्धारण करने और निर्णय लेने के प्रति जागरूक, सजग और सशक्त बनाती है|